न पेयजल,न साफ-सफाई, इस दुर्दशा से कैसे मिलेगी निजात
सुलतानपुर।लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों की सुविधाओं को लेकर जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की उदासीनता अब साफ नजर आने लगी है। कोई भी इसकी सुधि लेने वाला नहीं है।गन्दगी व झाड़ जाखड़ इसकी पहचान बन गई हैं।जिले में पत्रकारों के लिए स्थापित प्रेस क्लब आज बदहाली का शिकार है। क्लब परिसर में न तो पीने के पानी की व्यवस्था है और न ही साफ-सफाई, जबकि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि मूक दर्शक बने हुए हैं।पत्रकार जाड़ा, गर्मी और बरसात हर मौसम में अपने निजी संसाधनों से जनपद के कोने-कोने में जाकर खबरों का कवरेज करते हैं और जनसमस्याओं को आमजन व प्रशासन तक पहुंचाते हैं। विडंबना यह है कि उन्हीं पत्रकारों के बैठने और बैठक के लिए बनाए गए प्रेस क्लब की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।


प्रेस क्लब परिसर में उगी झाड़-झंखाड़ यह साबित करती है कि लंबे समय से इसकी सुध नहीं ली गई। शौचालयों में न पानी की व्यवस्था है और न ही साफ-सफाई। भवन के भीतर बैठने के लिए थोड़ी बहुत कुर्सिया और केवल एक तख्त और उस पर बिछा एक पुराना गद्दा ही उपलब्ध है, जो सुविधाओं के नाम पर महज औपचारिकता प्रतीत होता है।जिले में कई ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जो पत्रकारों से निकटता और लगाव दिखाते हैं,लेकिन प्रेस क्लब को मूलभूत सुविधाएं दिलाने के मामले में उन्होंने भी मुंह मोड़ रखा है।यदि किसी जनप्रतिनिधि द्वारा सुविधाएं दिलाने की बात कही भी जाती है, तो उसका असर धरातल पर दिखाई नहीं देता।कड़वा सच यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भले ही विशेष सुविधाएं न मिलें, लेकिन कम से कम उनके एकमात्र प्रेस क्लब में पेयजल, साफ-सफाई और बैठने जैसी बुनियादी सुविधाएं तो सुनिश्चित की जानी चाहिए।खैर यह भी तब संभव जब एक चौकीदार व सफ़ाई कर्मी स्थायी तौर पर रहे।सूत्रो की मानें तो मीडिया संकुल बनने का प्रस्ताव है।यदि जनप्रतिनिधि अफसरों से प्रयास कर दे तो शासन से निर्गत करोड़ो रू से भवन ट्रिपल पी माडल के रूप में बन जाएगा।इस डिजिटली करण युग में काम करने लगेगा।लेकिन सवाल वही इस कमीशन खोरी के युग में कोई रुचि क्यो ले।फिलहाल जिलाधिकारी कुमार हर्ष को इस मामले को संज्ञान में लेकर त्वरित एक्शन लेना चाहिए।






